२० कुछ मिथक

ताजमहल के बारे में सारे संसार में इतने अधिक किस्से प्रसिद्ध हैं कि उनमें से सत्य खोजना लगभग भूसे के ढेर में से सुई खोजने के समान है। वास्तविकता तो यह है कि इन किस्सों में सत्य का अंश नाम-मात्र का है तथा लगभग सभी सम्पूर्ण रूप से मन गढन्त हैं, परन्तु प्रचार-प्रसार पाकर अब ये किस्से जन-मानस में इतना अधिक पैठ चुके हैं कि उनके सामने यदि सत्य को उजागर करने का प्रयास किया जाए तो गम्भीरता से सुनना तो दूर मात्र मुस्करा कर चल देते हैं। कुछअधिक प्रगतिशील व्यक्ति तो इसे हिन्दू गौरब का बखान मात्र मानते हैं। ताजमहल के सन्दर्भ में अत्यधिक भ्रम उत्पन्न करने वाले निम्नलिखित किस्से हैं -
१. सम्राज्ञी का नाम मुमताज महल था।
२. सम्राज्ञी अतीव सुन्दरी थी एवं शाहजहाँ उसे जी-जान से चाहता था।
३. सम्राज्ञी ने मरते समय अपने पति से वचन लिया था कि वह उसकी कब्रपर एक अति सुन्दर मकबरा बनवायेगा।
४. ताजमहल को बनवाने के लिए सारे संसार के माडल मंगवाये गये थे तथा विश्व प्रसिद्ध कराीगरों ने इसका निर्माण किया।
५. ताजमहल में कब्र के ऊपर सदैव पानी टपकता है-शाहजहाँ ने कारीगरों के हाथ कटवा दिये थे।
इन किस्सों को सत्य की कसौटी पर कसें।
(१)
सम्राज्ञी का नाम मुमताज महल था जिसके संक्षिप्तीकरण के रूप में इस भवन का नाम ताजमहल हुआ। यह नितान्त सत्य से परे है। सम्राज्ञी का वास्तविक नाम अर्जुमन्द बनों बेगम था। ऐसा प्रतीत होता है कि शाहजहाँ के विवाह अथवा राज्यारोहण के पश्चात्‌ इसका नाम बदल कर मुमताज उल जमानी कर दिया था। देखिये बादशाहनामा के पृष्ठ ४०२ की अन्तिम पंक्ति। उस समय के सभी अभिलेखों में यही दो नाम प्राप्त हैं। अब प्रश्न उठता है कि इस भवन का नाम ताजमहल कैसे पड़ा ? स्पष्ट है कि जो महलों का ताज वह ताजमहल। मैं श्री ओक जी के इस कथन से सहमत नही हो पा रहा हूँ कि इसका नाम 'तेजोमहालय' था।
(२)
कोई मूर्ख भी नहीं कहेगा कि सम्राज्ञी सुन्दरी नहीं थी। सम्राज्ञी शब्द के साथ ही सुन्दरता जुड़ी होती है, फिर वह तो विश्व प्रसिद्ध सुन्दरी नूरजहाँ की भतीजी थी। पर यह भी सत्य है कि अपने अन्तिमवर्षों में वह एक गतयौवना तथा १४ प्रसवों का भार वहन करने के कारण अधेड़ हो चुकी थी। उसकी आयु भी लगभग ४० वर्ष थी। बादशाहनामा के खण्ड दो के पृष्ठ २७ पर लिखा है '१७ जिल्दकाद १०४० हिजरी को ४०वें वर्ष की आयु में नवाब आलिया बेगम (मुमताज) का देहान्त हुआ। अपने मात्र १८ वर्ष के विवाहित जीवन में १४ सन्तानों को जन्म देने वाली किसी महिला के आज भी यदि आप दर्शन करेंगे तो उसकी थुलथुल काया बढ़ा हुआ पेट तथा गडढे में धंसी आंखें आपको सब कुछ स्पष्ट कर देंगी।
कीने की हैन्डबुक के पृष्ठ ३७ के अन्त में इन सन्तानों का विवरण इस भांति किया गया है-(१) हुरियल निसा (कन्या) जन्म सन्‌ १६१३, मृत्यु सन्‌ १६१६। (२) जहानआरा (कन्या) जन्म १६१४ (इससे शाहजहाँ के घृणात्मक शारीरिक सम्बन्धों के किस्से प्रचलित थे। (३) मुहम्मद दारा शिकोह (पु) जन्म सन्‌ १६१५। (४) मुहम्मद शाहशुजा (पुत्र) जन्म सन्‌ १६१६। (५) रोशन आरा (कन्या) जन्म सन्‌ १६१७। (६) मुहम्मद औरंगजेब (पुत्र) जन्म सन्‌ १६१८। (७) उम्मेद बखत (पुत्र) जन्म सन्‌ १६१९ मृत्यु सन्‌ १६२१। (८) सुरैया बानों (कन्या) जन्म सन्‌ १६२१, मृत्यु सन्‌ १६२८। (९) सन्‌ १६२२ में पुत्र जन्मते ही मर गया। (१०) मुराद बक्स(पुत्र) जन्म सन्‌ १६२४ (११) लतफुल्ला (पुत्र) जन्म सन्‌ १६२६, मृत्यु सन्‌ १६२८। (१२) दौलत अफजल (पुत्र) जन्म सन्‌ १६२८, मृत्यु अगले वर्ष। (१३) सन्‌ १६३० में जन्मी पुत्री जन्म के समय ही मर गई। (१६) गौहर आरा (पुत्री) जन्म सन्‌ १६३१, इसी पुत्री को जन्म देकर सम्राज्ञी परलोक सिधार गई थी।
यही नहीं १४ सन्तानों के गर्भ-भार तथा प्रसव-पीड़ा के अतिरिक्त इस दुर्भाग्यशाली नारी ने सात संतानों की मृत्यु का दुख भी वहन किया। माता के लिए सन्तान की मृत्यु तथा पत्नी के लिए पति का विछोह अथवा उसके प्राणों पर आया संकट सबसे अधिक दुखदायी होता है। सन्‌ १६२३-२४ ई. में जब शाहजादा खुर्रम ने जहाँीर के विरुद्ध विद्रोह किया था तथा अपनी जान बचाने के लिए दर-दर की खाक छान रहा था उस समय पत्नी होने के नाते मुमताज पर क्या बीत रही होगी, उसकी मात्र कल्पना ही की जा सकती है। दो वर्ष का त्रासदायी समय कुछ कम नहीं होता है। ऐसी महिला के बारे में यह कहना कि वह अद्वितीय सुन्दरी थी तथा उस पर शाहजहाँ जी-जान से फिदा था, मात्र सत्य को झुठलाना ही कहा जाएगा।
(३)
सम्राज्ञी की मृत्यु बुरहानपुर में हुई थी। वहीं पर आज तक उसकी कब्र सुरक्षित है। कुछ पुस्तकों में शाहजहाँ एवं मुमताजके अन्तिम मिलन का वर्णन बहुत स्पष्ट है। शाहजहाँ को शाहजादी जहान आरा ने अपनी माता के अन्तिम सयम की सूचना दी तो सम्राट्‌ मुमताज की शैया के समीप गया। सम्राज्ञी लगातार बिलखती तथा विलाप करती रही एवं रो-रोकर उसने सम्राट्‌ से अपने पुत्र-पुत्रियों के प्रति दया एवं कृपा की याचना की तथा अपने माता-पिता का ध्यान रखने का आग्रह करती रही।
उपरोक्त वर्णन मुहम्मद सलीह कम्बुह द्वारा लिखित 'अमाल-ए-सली' तथा शाहजहाँकालीन कई अन्य लेखकों ने किये हैं तथा इसे भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'ताज म्यूजियम' में डॉ. जेड. ए. देसाई तथा एच. के. कौल द्वारा उद्‌धृत किया गया है। उक्त लेख से स्पष्ट है कि सम्राज्ञी नेअपनी याद में भव्य मकबरा बनाने जैसा कोई वचन शाहजहाँ से अन्तिम समय में नहीं लिया था। उक्त लेखक-द्वय की दृष्टि में भी ऐसा वचन मात्र कपोल-कल्पना ही है।
उक्त वर्णन में एक अन्य बात भी स्पष्ट है कि सम्राज्ञी लगातार रो रही थी। ऐसे कष्टदायक समय में भव्य मकबरा बनवाने जैसी बात तो ध्यान में आ ही नहीं सकती है। हाँ ! क्रूर बादशाह क हाथों अपने परिवारजनों तथा सन्तानों की रक्षा की चिन्ता में रोना बिलखना समझ में अवश्य आता है।
(४)
ताजमहलको बनवाने के लिए माडल मंगवाये गये थे, यह भी तथ्यों से परे है। यद्यपि सम्राज्ञी की मृतयु तिथि पर इतिहासकार एक मत नहीं हैं फिर भी एक बात सभी मानते हैं कि मकबरा बनाना प्रारम्भ (सम्राज्ञी की मृत्ये के पश्चात्‌) तुरन्त करा दिया गया था। क्या इतने कम समय में संसार के अन्य देशों को सन्देश भेजा जाना उस युग में सम्भव था जबकि यातायात तथा संचार-साधन लगभग नगण्य थे। सर्व श्री आर. सी. टेम्पिल तथा ई. बी. हैवल की आधुनकि खोज भी यही कहती है कि कहीं से माडल नहीं मंगाये गये थे। विदेशी यात्री पीटर मुण्डी तथा जीन बैपटिस्ट टैवर्नियर ने भी माडल मंगाने का वर्णन नहीं किया है, जब कि बादशाहनामा का लेखक अब्दुल हमीद लाहोरी तो स्पष्ट लिखता है कि शव को राजा मानसिंह के महल में दफनाया गया था।
अनेक देशों से कारीगर बुलवाये गये थे, यह भी इसकी (ताजमहल) महानता को सिद्ध करने के लिए किस्सा गढ़ा गया था। वास्तव में प्रारम्भ से ही भारत की वास्तुकला विश्व प्रसिद्ध रही है। तैमूर लंग से लेकर अन्य आये हुए सभी आक्रमणकारी भारतवर्ष से कारीगर पकड़ कर ले गये थे। इसके अतिरिक्त जब शाहजहाँ ने भवन (मकबरा) बनवाया ही नहीं था तो सारे संसार से कारीगरमंगवाने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता है। मात्र कब्र बनाने तथा कुरान लिखने योग्य प्रतिभावान कारीगरों की कमी उस समय के भारत की राजधानी आगरा में नहीं थी।
(५)
सबसे विचित्र तथा भ्यानक किंवदन्ती है कि शाहजहाँ ने इस भय से कारीगरों के हाथ कटवा दिये थे कि वे लोग दूसरा ताजमहल किसी और स्थान पर न बना दें। मुमताज एवं शाहजहाँ दोनों ही पर्याप्त क्रूर थे, अस्तु! उसके द्वारा कारीगरों को प्रोत्साहन देने के स्थान पर उनके हाथ कटवा देना कोई आश्चर्यजनक कार्य नहीं हो सकता था, परन्तु इसके साथ ही एक हास्यास्पद किस्सा और भी जुड़ा है।
ताजमहल पूरा बन जाने के पश्चात्‌ शाहजहाँ ने निरीक्षण किया। सभी मुखय कारीगर ताजमहल परिसर में ही उपस्थित थे। शाहजहाँ ने आज्ञा दी कि इन सभी कारीगरों के हाथ काट दिये जाएं जिससे भविष्य में ये लोग ताजमहल की अनुकृति न बना सकें। इस पर एक कारीगर बोला, 'जहाँपनाह ! ताजमहल के गुम्बद में कुछ दोष रह गया है जिसे मेरे अतिरिक्त संसार का कोई कारीगर ठीक नहीं कर सकता है। यदि आज्ञा हो तो मैं उसे ठीक कर दूं। बाद में आप मेरे हाथ कटवा दीजियेगा, क्योंकि हाथ कट जाने के पश्चात्‌ मैं भी उस दोष को दूरनहीं कर सकूंगा।
शाहजहाँ ने आज्ञा दे दी। उस कारीगर ने हथैड़ी उठाई तथा गुम्बद पर चढ़ गया। ऊपर जाकर उसने हथैड़ी से गुम्बद को ठोका और नीचे आकर शाहजहाँ का ेसूचित कर दिया कि वह दोष दूर कर आया है। शाहजहाँ ने उसके तथा अन्य सब कारीगरों के हाथ कटवा दिये। चारों ओर रोना-पीटना तथा कोहराम मच गया, परन्तु गुम्बद ठीक करने वाला कारीगर ठठा कर हंस रहा था। शाहजहाँ ने उससे हंसने का कारण पूछा तो वह बोला, 'बन्दा परवर ! हम लोगों ने जी-जान से काम किया। उसका बदला यह होता कि आप हम लोगों को ईनाम इकराम देते, परन्तु हमारी इज्जत करने के बदले आपने हमारे हाथ कटवा दिये। इसलिये मैं इस हथैड़ी से गुम्बद की छत में एक ऐसा सुराख कर आया हूँ जिससे हर मौसम में पानी की एक बूंद मुमताज की कब्र पर आँसू बनकर गिरा करेगी। अब इस दोष को संसार का कोई भी कारीगर दूर नहीं कर सकता।' भोजे-भाले यात्रियों को गाइड आज भी हाथ की सफाई से टपकती हुई बूँद दिखा कर कुछ रकम ऐंठ लेते हैं।
कब्र वाले कक्ष के ऊपर गुम्बट है। इसकी ऊँचाई ८० फुट है तथा ऊपर मध्य में एक बृहत्‌ सूर्य-चक्र है। इसी प्रकार के सूर्य-चक्र तथा कथित मस्जिद तथा जवाबमें भी हैं। इस भयानक ऊँचाई (आज के ८ महला भवन के समान) को देखकर दर्शक को भ्रम होता है कि इसके ही ऊपर वाला भाग गुम्बद की छत है, और जो वर्षा का जल गुम्बद पर गिरता है वही रिसकर कब्र पर आता है। यह मात्र भ्रम है।
ताजमहल का ऊपर से एक दिखाई देने वाला गुम्बद वास्तव में दो खण्ड का है। पहला खण्ड ८० फीट ऊँचा, उसके ऊपर १३ फीट मोटी गोल (गुम्बदाकार) छत, उसके ऊपर दूसरा ८० फीट ऊँचा खण्ड, उसके ऊपर १३ फीट मोटी छत जिसके ऊपर ६ इंच मोटा संगमरमर का पत्थर है।
गुम्बद के इस रहस्य को जानने के पश्चात्‌ अब उक्त कारीगर के कथित कथन की समीक्षा की जाए। ऐसी कौन-सी हथैड़ी अथवा भारी से भारी घन है जो १३.५ फीट मोटी छत में छेद (अति बारीक) कर देने में समर्थ है। सम्भव है छेद हो भी गया हो तो सन्‌ १६५३ से सन्‌ १९९७ ई. में (३४४ वर्ष पश्चात्‌) वह मामूली सा छिद्र नाली बन गया होता, क्योंकि जल के बहाव में पत्थर को काटने की अकूत क्षमता होती है। इस प्रकार एक बूंद के स्थान पर वर्षा ऋतु में कब्र पर नाला बहना चाहिए।
कल्पना करिये यदि एक बूंद पानी रिस कर गिरा भी तो वह बीच वाली छत पर गिर कर सूख जायेगा। यदि अधिक पानी गिरेगा तो छत के बीचमें ऊँचा तथा किनारों पर नीचा होने के कारा वह बहकर दीवारों की ओर चला जायेगा। कब्र पर गिरने का तो प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि छेद तो बीच वाली छत में किया ही नहीं गया था। एक प्रश्न यह है कि वर्षा ऋतु के पश्चात्‌ पानी कहाँ से गिरता है। मैं स्वयं दोनों छतों पर चढ़ कर देख चुका हूँ वहाँ पर कोई टंकी नहीं है।
सितम्बर १९९६ ई. में सरकार ने कब्र वाले कक्ष में बहुमूल्य कालीन बिछाने की घोषणा की है। यदि वहाँ पर हर क्षण एक बूंद पानी टपकता है तो कालीन तो एक मास में सत्यानाश हो जायेगी।
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